मुद्रा बैंकिंग:मुद्रा स्फीति

☺️मुद्रा स्फीति वह स्थिति होती है जिसमें मुद्रा का मूल्य कम होता है और कीमत स्तर में वृद्धि होती है अर्थात महँगाई बढती है।

☺️अर्थशास्त्री कीन्स के अनुसार वास्तविक मुद्रा स्फीति की स्थिति अर्थव्यवस्था मे पूर्ण रोजगार विन्दु के बाद ही उत्पन्न होती है।

☺️रोजगार विन्दु के पूर्व उत्पन्न मुद्रा स्फीति आंशिक होती है और प्रेरणादायक होती है।

☺️ मांग प्रेरित स्फीति : जब वस्तुओं और सेवाओं की मांग बढने से मुद्रा की सक्रियता बढती है और कीमत स्तर में वृद्धि होती है।

☺️लागत प्रेरित स्फीति : जब वस्तुओं और सेवाओं की लागत बढ जाने से कीमत बढती है।

☺️साख स्फीति : यह तब उत्पन्न होती है जब उदार ऋण नीति के कारण व्यापारिक बैंक द्वारा अत्यधिक साख निर्गमन होता है।

☺️चलन स्फीति : जब देश या अर्थव्यवस्था में जरूरत से ज्यादा मुद्रा का निर्गमन हो जाता है।

☺️ अवमूल्यन स्फीति : जब अवमूल्यन के फलस्वरूप  निर्यात बढ जाता है और आन्तरिक पूर्ति कम हो जाती है तब भी कीमतें बढने लगती हैं।

☺️मुद्रा स्फीति की स्थिति में ऋणी को लाभ तथा ऋण देने वाले को हानि होती है।

☺️आयात में वृद्धि और निर्यात में कमी होने की वजह से व्यापार असंतुलन का संकट पैदा हो जाता है।

मुद्रा स्फीति नियंत्रण के उपाय :

1)राजकोषीय उपाय-
👍बजट बनाने में संतुलन
👍सार्वजनिक व्यय पर नियंत्रण
👍सार्वजनिक ऋण में वृद्धि करना
👍उत्पादन में वृद्धि करना
👍बचत को प्रोत्साहित करना
👍प्रगतिशील करारोपण सिद्धांत अपनाया जाना
2) मौद्रिक उपाय:
👍मुद्रा निर्गमन पर नियंत्रण
👍कठोर साख नीति का पालन करना
👍मुद्रा मात्रा में संकुचन रखना

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